आज साहित्यिक आंगन में बिहार, बेगूसराय की सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ सुनीता ‘सुमन’ जी की एक ग़ज़ल

लौ फ़िक्र के दिए की बढ़ाकर ग़ज़ल कहो।
लफ़्ज़ों को ख़ून दिल का पिला कर ग़ज़ल कहो।।
मरहम न काम आएगा कहने में अब ग़ज़ल।
सोज़े निहाँ को और बढ़ा कर ग़ज़ल कहो।।
हर मिसरा बोल उठ्ठेगा हर एक शेर का।
हस्ती को यार अपनी मिटाकर ग़ज़ल कहो।।
ज़ुल्फ़ों के तुमने ख़ूब क़सीदे तो लिख दिए।
चेहरे को मेरे चांद बता कर ग़ज़ल कहो।।
लिखनी है ख़ूबियाँ मिरे रुख़सार ओ ज़ुल्फ़ की।
मुझको तसव्वुरात में ला कर ग़ज़ल कहो।।
आए न रास दिन का उजाला अगर तुम्हें।
दिल अपना तीरगी में जला कर ग़ज़ल कहो ।।
हर शेर उम्दा होगा तुम्हारा भी ए “सुमन”।
तुम दिल में क़ाफ़िए को सजा कर ग़ज़ल कहो।।
~ डॉ सुनीता ‘सुमन’
















