नई दिल्ली, 13 अप्रैल (अशोक “अश्क”) 70 के दशक की शुरुआत में बॉलीवुड पर राज था राजेश खन्ना का। उनकी दीवानगी ऐसी थी कि लड़कियां खून से खत लिखती थीं और उनकी कार लिपस्टिक के निशानों से भर जाती थी। लेकिन वक्त बदला और फिल्मों की दुनिया में नई हवा चलने लगी। आम धारणा है कि अमिताभ बच्चन की फिल्म जंजीर ने काका के दौर को चुनौती दी, लेकिन असली झटका कहीं और से आया।

यह चुनौती थी मिथुन चक्रवर्ती की, जो एक अलग अंदाज और ‘स्वैग’ के साथ उभरे। राजेश खन्ना की पहचान रोमांस और भावनाओं से जुड़ी थी, लेकिन 70 के दशक के मध्य तक दर्शकों का टेस्ट बदलने लगा। अब युवाओं को एक्शन, स्टाइल और रियल कनेक्ट चाहिए था। इसी बदलाव ने मिथुन के लिए रास्ता खोला। 1976 में फिल्म मृगया से डेब्यू कर मिथुन ने नेशनल अवॉर्ड जीतकर इंडस्ट्री में हलचल मचा दी। वे एक आउटसाइडर थे, लेकिन उनकी मेहनत और प्रोफेशनलिज्म ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

वहीं दूसरी ओर, राजेश खन्ना के बारे में कहा जाने लगा कि उनका अनुशासन ढीला पड़ रहा है।फिर आया 80 का दशक और डिस्को डांसर ने इतिहास रच दिया। मिथुन न सिर्फ भारत बल्कि सोवियत यूनियन तक छा गए। वे गरीब और छोटे शहरों के सुपरस्टार बन गए, जबकि काका की लोकप्रियता सीमित होती गई। विशेषज्ञों का मानना है कि अमिताभ बच्चन ने जहां ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि बनाई, वहीं मिथुन ने मास ऑडियंस को अपनी ओर खींच लिया। उनकी डांस स्टाइल और एक्शन ने बॉलीवुड का ट्रेंड बदल दिया। समय के साथ राजेश खन्ना एक लेजेंड बन गए, लेकिन 70 के दशक के अंत और 80 के दशक की शुरुआत में मिथुन चक्रवर्ती ने उनके स्टारडम को कड़ी चुनौती देकर खुद को वन मैन इंडस्ट्री साबित कर दिया।

















