नई दिल्ली, 01 अप्रैल (अशोक “अश्क”) वैश्विक स्तर पर अमेरिका-ईरान तनाव के चलते कच्चे तेल और गैस की सप्लाई पर मंडरा रहे खतरे ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। देश अपनी जरूरत का करीब 85% तेल और 70% गैस आयात करता है, ऐसे में किसी भी बाधा का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। लेकिन इसी संकट के बीच अंडमान-निकोबार के गहरे समुद्र से एक बड़ी उम्मीद सामने आई है।

सरकार की नई ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP) के तहत अंडमान बेसिन जैसे ‘नो-गो’ क्षेत्र को खोल दिया गया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहां करीब 371 मिलियन टन ऑयल इक्विवेलेंट संसाधन छिपे हो सकते हैं। इसे भारत के सबसे संभावनाशील ऑफशोर क्षेत्रों में गिना जा रहा है।इस दिशा में Oil India Limited और Oil and Natural Gas Corporation ने ड्रिलिंग अभियान तेज कर दिया है। ओआईएल ने विजयपुरम-1, 2 और 3 कुओं की खुदाई की, जिसमें विजयपुरम-2 से 87% मीथेन वाली गैस के संकेत मिले हैं।

वहीं ओएनजीसी ने AND-P1 अल्ट्रा-डीपवॉटर कुएं में 4000 मीटर तक ड्रिलिंग पूरी कर ली है और 6000 मीटर तक जाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि अभी यह क्षेत्र ‘फ्रंटियर’ चरण में है, यानी व्यावसायिक उत्पादन दूर है। विशेषज्ञ सौरव मित्रा के अनुसार, शुरुआती सफलता उत्साहजनक है, लेकिन उत्पादन शुरू होने में 6 से 10 साल लग सकते हैं।तकनीकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। समुद्र के भीतर पाइपलाइन बिछाना, गैस को लिक्विफाई करना और मुख्य भूमि तक पहुंचाना बेहद जटिल और महंगा काम है। फिर भी सरकार तीन-स्तरीय रणनीति पर काम कर रही है—पुराने क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाना, मौजूदा बेसिनों का पूरा उपयोग और अंडमान जैसे नए क्षेत्रों की खोज।विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सब कुछ योजना के अनुसार चला, तो 2030 के दशक तक भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल सकती है और आयात पर निर्भरता में बड़ी कमी आ सकती है।

















