नई दिल्ली, 01 अप्रैल (अशोक “अश्क”) ईरान युद्ध के चलते वैश्विक समुद्री व्यापार पर गहराता संकट अब भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर डालने लगा है। सोमवार तक फारस की खाड़ी में भारत की ओर आ रहे 28 जहाज लंगर डालकर खड़े रहे, जिनमें 18 भारतीय ध्वज वाले और 10 विदेशी टैंकर शामिल हैं। इन जहाजों का इस तरह फंसा रहना होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही को लेकर ईरान के भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

शिपिंग मंत्रालय के स्पेशल सेक्रेटरी राजेश सिन्हा ने बताया कि फंसे विदेशी टैंकरों में से तीन एलपीजी, तीन एलएनजी और चार कच्चे तेल से लदे हुए हैं। उन्होंने साफ कहा कि सरकार की पहली प्राथमिकता भारतीय झंडे वाले जहाजों को सुरक्षित तरीके से होर्मुज से पार कराना है।हालांकि, कुछ राहत की खबर भी सामने आई है। शनिवार को दो एलपीजी टैंकरों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी गई, जिन पर करीब 94,000 मीट्रिक टन कुकिंग गैस लदी है। ये जहाज जल्द ही मुंबई पोर्ट और न्यू मैंगलोर पोर्ट पहुंचने वाले हैं।जानकारी के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद अब तक कम से कम चार भारतीय जहाज इस संवेदनशील मार्ग से निकलकर भारत पहुंच चुके हैं। लेकिन हालात अब भी बेहद जोखिम भरे बने हुए हैं। राजेश सिन्हा ने स्पष्ट किया कि खतरा सिर्फ होर्मुज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाहरी इलाके भी हाई-रिस्क जोन में शामिल हो चुके हैं।स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि समुद्री बीमा कंपनियों ने कमर्शियल बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी कर दी है और आने वाले दिनों में यह और बढ़ सकता है। इससे शिपिंग लागत में इजाफा होना तय माना जा रहा है, जिसका असर सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।मध्य मार्च में पहली बार दो एलपीजी टैंकरों के सुरक्षित गुजरने की पुष्टि हुई थी, जबकि 29 मार्च के आसपास दो और जहाज इस रास्ते से निकल पाए। इससे संकेत मिलता है कि ईरान फिलहाल सीमित छूट देकर मित्र देशों के जहाजों को गुजरने दे रहा है, लेकिन प्रक्रिया बेहद धीमी है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरानी संसद टोल वसूली में छूट देती है, तो जहाजों की आवाजाही में तेजी आ सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें होर्मुज पर टिकी हैं, जहां हर गुजरता जहाज वैश्विक अर्थव्यवस्था की सांसें थामे हुए है।
















