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हर बात बुरी लगती है

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में मध्यप्रदेश, रीवा से सुप्रसिद्ध कवि संगीत पांडेय की की एक ग़ज़ल

दिन भी लगते हैं बुरे रात बुरी लगती है।

तू न हो साथ तो हर बात बुरी लगती है।

रंज-ओ-ग़म पहले परेशान किया करते थे,

अब तो ख़ुशियों की भी सौग़ात बुरी लगती है।

जीत भी अपनी मुझे भाती नहीं है बिल्कुल,

कौन कहता है फ़क़त मात बुरी लगती है।

हक़ मेरा जो भी हो ला कर के रखो हाथों में,

मुझको फेंकी हुई ख़ैरात बुरी लगती है।

याद हर वक़्त किसी बे-वफ़ा को कर कर के,

हो अगर आँखों से बरसात बुरी लगती है।

सिर्फ़ काँटे ही दुखी करते तो वाजिब होता,

मुझको फूलों की भी अब ज़ात बुरी लगती है।

दिल नहीं जिनसे मिला करता है “संगीत” मेरा,

ऐसे लोगों से मुलाक़ात बुरी लगती है।

~ संगीत पांडेय

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