नई दिल्ली, 05 मई (अशोक “अश्क”) 15 वर्षीय नाबालिग की 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने के संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार और एम्स के खिलाफ चल रही अवमानना कार्यवाही को बंद कर दिया। अदालत ने माना कि उसके आदेश का पालन कर दिया गया है, इसलिए आगे कार्रवाई की जरूरत नहीं है। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत की कड़ी टिप्पणियों ने पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि 24 अप्रैल को दिए गए आदेश का पूरी तरह पालन कर लिया गया है। इसके बाद पीठ ने स्पष्ट कहा कि अब अवमानना याचिका पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं बचता और कार्यवाही समाप्त की जाती है।सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेना बेहद कठिन होता है, लेकिन अदालत को परिस्थितियों को देखते हुए हस्तक्षेप करना पड़ता है। उन्होंने चेताया कि अगर एम्स जैसे संस्थान जिम्मेदारी लेने से पीछे हटते हैं, तो इससे नाबालिग की जान को खतरा हो सकता है, क्योंकि वह असुरक्षित और अवैध तरीकों का सहारा ले सकती है।

गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने 24 अप्रैल को नाबालिग को अनचाही गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी। इसके बाद 30 अप्रैल को एम्स की उस मांग को खारिज कर दिया गया, जिसमें गर्भावस्था जारी रखने की बात कही गई थी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि किसी भी नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

















