पटना, 18 अगस्त (पटना डेस्क) बिहार के चर्चित सीवान फायरिंग कांड ने अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर नया मोड़ ले लिया है। मामले की गूंज अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और पुलिस कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई है। घटना के बाद जहां विपक्ष सरकार और पुलिस प्रशासन पर लगातार हमलावर है, वहीं प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए थे।प्रशासन के अनुसार, घटनास्थल पर मौजूद एक पुलिस जवान भीड़ के बीच फंस गया था। इसी दौरान परिस्थितियां अचानक तनावपूर्ण हो गईं। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि संबंधित जवान ने बिना सक्षम आदेश के AK-47 से फायरिंग कर दी, जो निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत माना जा रहा है।

इस मामले को गंभीरता से लेते हुए विभाग ने संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी है। हालांकि प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि घटना से जुड़े सभी पहलुओं की विस्तृत जांच अभी जारी है। फायरिंग की वास्तविक परिस्थितियां, गोली चलाने की आवश्यकता, मौके की स्थिति और जिम्मेदारियों का निर्धारण जांच रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इधर, घटना के बाद बिहार की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्षी दलों ने सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है और पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि यदि पुलिस ने नियमों का पालन किया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती।

दूसरी ओर, सरकार का पक्ष है कि भीड़ को नियंत्रित करना आवश्यक था और नियमों का उल्लंघन करने वाले पुलिसकर्मी पर कार्रवाई कर यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि अनुशासन से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच चुका है, पूरे प्रदेश की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत की निगरानी में होने वाली जांच और प्रशासनिक कार्रवाई से यह तय होगा कि सीवान फायरिंग कांड में जिम्मेदारी किसकी तय होती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।














