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पिघलता हिमालय, खतरे में आधी दुनिया: ग्लोबल वार्मिंग से जल संकट का महासंकट, 75% ग्लेशियर खत्म होने की चेतावनी

नई दिल्ली, 27 अप्रैल ((अशोक “अश्क”) जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पृथ्वी के पर्वतीय क्षेत्र तेजी से संकट की चपेट में आ रहे हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो इस सदी के अंत तक हिमालय के 75 से 80 प्रतिशत ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं, जिससे अरबों लोगों की जिंदगी पर सीधा असर पड़ेगा।विशेषज्ञों के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र, जिसे “तीसरा ध्रुव” भी कहा जाता है, दुनिया के दो अरब लोगों को पानी और भोजन उपलब्ध कराता है।

लेकिन लगातार बढ़ते तापमान, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण यहां के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, 1950 के दशक से हिमालयी ग्लेशियर हर साल 3-4 मीटर तक सिमट रहे थे, लेकिन अब यह दर बढ़कर 30-60 मीटर प्रति दशक हो गई है। गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा नदी का प्रमुख स्रोत है, प्रति वर्ष 28-30 मीटर की रफ्तार से पीछे हट रहा है और 1935 से 2022 के बीच करीब 1700 मीटर सिकुड़ चुका है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और अन्य शोध संस्थानों की रिपोर्ट के अनुसार, तापमान में वृद्धि और कम हिमपात इस तेजी से पिघलाव के मुख्य कारण हैं।

इसका असर सिर्फ पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान जैसे देशों की जल सुरक्षा और कृषि व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। आईसीआईएमओडी ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं रोका गया, तो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान होगा। इससे नदियों का प्रवाह घटेगा, कृषि उत्पादन कम होगा और करोड़ों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी। नेपाल जैसे देशों में पहले ही बाढ़, भूस्खलन और अनियमित मानसून की घटनाएं बढ़ रही हैं। वहीं, वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी ग्लेशियरों के लगातार टूटने और पिघलने से भारत की लगभग 40 प्रतिशत आबादी प्रभावित हो सकती है, जो इन नदियों पर निर्भर है।विशेषज्ञों ने चेताया है कि अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है। औद्योगिक उत्सर्जन में कमी, वनों का संरक्षण और पारंपरिक तकनीकों जैसे ‘स्नो हार्वेस्टिंग’ को बढ़ावा देकर इस खतरे को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। फिलहाल सवाल यही है क्या दुनिया समय रहते संभलेगी या ‘पिघलता हिमालय’ मानवता के लिए सबसे बड़ा संकट बन जाएगा?

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