पटना, 08 अगस्त (अविनाश कुमार) पटना हाईकोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसले में निचली अदालत के एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का निर्देश देकर न्यायिक व्यवस्था में हलचल मचा दी है। अदालत ने हत्या के प्रयास के एक मामले में आरोपी को दी गई नियमित जमानत को रद्द करते हुए पूरे प्रकरण का रिकॉर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का आदेश दिया है, ताकि संबंधित न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सके।मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकलपीठ ने की। यह फैसला श्याम सुंदरी देवी द्वारा दायर जमानत रद्द करने की याचिका पर सुनाया गया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि दीघा थाना क्षेत्र में दर्ज हत्या के प्रयास के मामले में आरोपी धर्मेंद्र कुमार को तथ्यों की अनदेखी करते हुए नियमित जमानत दे दी गई थी।

मामले के अनुसार, धर्मेंद्र कुमार पर आरोप है कि उसने पिस्तौल से गोली मारकर श्याम सुंदरी देवी के पुत्र मुकेश उर्फ गोपी को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। चार्जशीट में शामिल पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) की चिकित्सीय रिपोर्ट में चोट को गंभीर प्रकृति का बताया गया था। इसके बावजूद 22 जुलाई 2024 को आरोपी को नियमित जमानत प्रदान कर दी गई।हाईकोर्ट ने अपने 43 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में स्पष्ट कहा कि जिन आधारों पर जमानत दी गई, वे अभियोजन के रिकॉर्ड और पीड़ित की इंज्यूरी रिपोर्ट से बिल्कुल मेल नहीं खाते। अदालत ने इस पर भी गंभीर सवाल उठाया कि जिस दिन आरोपी की नियमित जमानत अर्जी सुनवाई के लिए निर्धारित ही नहीं थी, उस दिन उसे रिहा करने का आदेश आखिर किन परिस्थितियों में पारित किया गया।

अदालत ने आरोपी धर्मेंद्र कुमार की जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द करते हुए उसे दो सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। साथ ही महानिबंधक कार्यालय को आदेश दिया गया है कि इस मामले से संबंधित संपूर्ण अभिलेख कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं, ताकि संबंधित न्यायिक अधिकारी की भूमिका की जांच कर आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई की जा सके। पटना हाईकोर्ट के इस फैसले को न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक प्रक्रिया में तथ्यों की अनदेखी या नियमों से हटकर लिए गए फैसलों पर उच्च न्यायालय गंभीर रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। फिलहाल इस फैसले की न्यायिक और कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा हो रही है।













