पटना, 01 अप्रैल (अविनाश कुमार) दुनिया भर में बाल श्रम और शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाले नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी आज एक ऐसी प्रेरणा बन चुके हैं, जिन्होंने अपने जीवन को मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। मध्य प्रदेश के विदिशा में 1954 में जन्मे सत्यार्थी ने एक सफल इंजीनियरिंग करियर छोड़कर 1980 में बच्चों की आज़ादी की लड़ाई शुरू की।

उन्होंने बचपन बचाओ आंदोलन की स्थापना कर अब तक 1 लाख से अधिक बच्चों को बंधुआ मजदूरी, तस्करी और बाल श्रम से मुक्त कराया। 1998 में उनके नेतृत्व में चला ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर 103 देशों तक पहुंचा, जिसने दुनिया को झकझोर दिया और कड़े अंतरराष्ट्रीय कानूनों का रास्ता साफ किया।सत्यार्थी को 2014 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे उन्होंने मलाला यूसुफजई के साथ साझा किया।

उन्होंने ‘गुडवीव’ जैसी पहल से कालीन उद्योग में बाल श्रम के खिलाफ मजबूत अभियान चलाया।उनका मानना है कि “जब तक एक भी बच्चा गुलाम है, तब तक दुनिया स्वतंत्र नहीं हो सकती।” ‘करुणा का वैश्वीकरण’ उनका मूल मंत्र है, जिसे वे लगातार अपने अभियानों के जरिए आगे बढ़ा रहे हैं।आज भी सत्यार्थी ‘सुरक्षित बचपन, सुरक्षित भारत’ अभियान के तहत देशभर में जागरूकता फैला रहे हैं। उनका संघर्ष न सिर्फ लाखों बच्चों के जीवन में रोशनी लाया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर बाल अधिकारों को नई ताकत भी दी है।
















