नई दिल्ली, 06 अप्रैल (अशोक “अश्क”) ईरान में हुए एक बेहद गुप्त और जोखिम भरे सैन्य अभियान ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। अमेरिका ने रविवार को यह साबित कर दिया कि वह अपने एक भी सैनिक को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। चाहे इसके लिए उसे करोड़ों डॉलर के अत्याधुनिक विमानों को ही क्यों न नष्ट करना पड़े। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब ईरानी सेना ने अमेरिकी वायुसेना के F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान को मार गिराया।

इस हमले के बाद उसमें सवार दो एयरमैन ईरान के अंदर फंस गए और लापता हो गए। हालात बेहद गंभीर हो गए, क्योंकि वे दुश्मन के इलाके में गहराई तक घुस चुके थे।इसके बाद अमेरिका ने तुरंत एक हाई-रिस्क रेस्क्यू मिशन लॉन्च किया। ईरान के रेगिस्तानी इलाके में बने अस्थायी हवाई अड्डे पर स्पेशल ऑपरेशंस ट्रांसपोर्ट विमान तैनात किए गए। मिशन का उद्देश्य फंसे हुए सैनिकों को सुरक्षित बाहर निकालना था। हालांकि, लैंडिंग के दौरान एक से दो विमान तकनीकी खराबी या नरम रेत में फंसने के कारण उड़ान भरने में असमर्थ हो गए।स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब ईरानी सेना तेजी से उस इलाके की ओर बढ़ने लगी।

ऐसे में अमेरिकी सैनिकों को बड़ा और कड़ा फैसला लेना पड़ा। उन्होंने उन फंसे हुए ट्रांसपोर्ट विमानों को बम से उड़ा दिया ताकि कोई भी संवेदनशील तकनीक दुश्मन के हाथ न लग सके। ईरान के सरकारी मीडिया द्वारा जारी तस्वीरों में जले हुए विमान के टुकड़े दिखाई दिए, जो संभवतः C-130 जैसे अत्याधुनिक ट्रांसपोर्ट विमान थे। इन विमानों की कीमत 100 मिलियन डॉलर से अधिक बताई जाती है और इनमें उन्नत संचार व नेविगेशन सिस्टम लगे होते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मिशन में शामिल सैनिकों की बहादुरी की सराहना की। वहीं, खुफिया सूत्रों के अनुसार CIA ने ईरान में भ्रम फैलाने के लिए झूठी सूचना भी फैलाई, जिससे दुश्मन गुमराह हो गया और ऑपरेशन को सफल बनाने में मदद मिली।यह ऑपरेशन एक बार फिर दिखाता है कि युद्ध में रणनीति, तकनीक और बलिदान तीनों की अहम भूमिका होती है।


















