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रोहतास-नवादा के जंगलों में खनन की तैयारी: 478 हेक्टेयर से ज्यादा पत्थर ब्लॉक नीलामी की राह पर, वन मंजूरी का इंतजार

पटना, 28 अगस्त (पटना डेस्क) बिहार के रोहतास और नवादा जिले के वन क्षेत्रों में चिह्नित पत्थर ब्लॉकों से खनन शुरू कराने की तैयारी तेज हो गई है। खान एवं भूतत्व विभाग ने इन ब्लॉकों की जल्द नीलामी और बंदोबस्ती की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है। हालांकि, वन भूमि पर खनन के लिए पहले गैर-वनीकरण उपयोग की केंद्रीय अनुमति हासिल करनी होगी। इसके लिए विभाग विशेषज्ञ सलाहकार नियुक्त करने जा रहा है। विभाग की योजना के मुताबिक सलाहकार वन भूमि से जुड़े प्रस्ताव तैयार कराने से लेकर केंद्रीय स्तर पर उसकी मंजूरी मिलने तक की पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा। वन भूमि को खनन जैसी गैर-वनीकरण गतिविधि में इस्तेमाल करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनुमति लेना अनिवार्य है।

विभागीय जानकारी के अनुसार रोहतास जिले के वन क्षेत्र में दो पत्थर भूखंड चिह्नित किए गए हैं। इनमें करबंदिया खंड-4 में 473 हेक्टेयर और गिजवाही खंड-3 में 5.33 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इसके अलावा नवादा जिले के तुंगी वन क्षेत्र में भी पत्थर के भूखंड चिह्नित किए गए हैं। इन क्षेत्रों की सीधे नीलामी नहीं की जा सकती। पहले वन भूमि को गैर-वनीकरण गतिविधि के लिए उपयोग करने की अनुमति लेनी होगी।इसके लिए केंद्रीय मंत्रालय के पोर्टल पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव जमा किया जाएगा। विभाग का मानना है कि विशेषज्ञ सलाहकार की मदद से प्रस्ताव तैयार करने और आवश्यक दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया को गति दी जा सकेगी।

खान एवं भूतत्व विभाग ने दक्ष और इच्छुक सलाहकार एजेंसियों एवं व्यक्तियों से विशेषज्ञ सलाहकार के लिए आवेदन मांगा है। इसके लिए महज तीन दिनों का समय दिया गया है और आवेदन की अंतिम तिथि 30 अगस्त निर्धारित की गई है। प्राप्त प्रस्तावों की जांच क्रय समिति करेगी और इसके बाद उपयुक्त सलाहकार का चयन किया जाएगा।सलाहकार की जिम्मेदारी केवल प्रस्ताव तैयार कर पोर्टल पर जमा कराने तक सीमित नहीं होगी। केंद्रीय स्तर से मांगे जाने वाले अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराने, आपत्तियों और आवश्यक प्रक्रियाओं का अनुपालन कराने से लेकर वन भूमि में खनन की अनुमति हासिल करने तक की जिम्मेदारी भी उसी की होगी। वन मंजूरी मिलने के बाद ही चिह्नित ब्लॉकों की नीलामी की राह साफ होगी। ऐसे में अब सबकी नजर केंद्रीय पर्यावरणीय अनुमति की प्रक्रिया पर टिकी है।

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