नई दिल्ली, 21 अगस्त (अशोक “अश्क”) बॉलीवुड की महान कोरियोग्राफर सरोज खान का नाम आज भी हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है। पर्दे पर अपने शानदार डांस निर्देशन से करोड़ों दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाली सरोज खान की निजी जिंदगी संघर्ष, दर्द और विश्वासघात से भरी रही। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद हौसले और प्रतिभा के दम पर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा जा सकता है।22 नवंबर 1948 को जन्मी सरोज खान का असली नाम निर्मला नागपाल था। भारत-विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आकर बस गया। आर्थिक तंगी इतनी गंभीर थी कि उन्हें महज तीन वर्ष की उम्र में ही बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में काम करना पड़ा। बाद में उन्होंने बैकग्राउंड डांसर के तौर पर फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

डांस सीखने के दौरान उनकी मुलाकात डांस मास्टर सोहन लाल से हुई। सरोज खान ने एक साक्षात्कार में बताया था कि केवल 13 वर्ष की उम्र में उनकी शादी उनसे करीब 30 वर्ष बड़े सोहन लाल से करा दी गई। शादी के बाद उन्हें यह पता चला कि उनके पति पहले से विवाहित हैं और चार बच्चों के पिता भी हैं। यह सच उनके लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं था।दर्द यहीं खत्म नहीं हुआ। उनके दूसरे बेटे का महज आठ महीने की उम्र में निधन हो गया। बेटे को दफनाने के तुरंत बाद भी उन्होंने अपने पेशेवर दायित्व निभाते हुए शूटिंग पर जाना जारी रखा। बाद में जब सोहन लाल ने बच्चों को अपना नाम देने से इनकार कर दिया, तो सरोज खान ने उनसे अलग होने का फैसला किया। इसके बाद व्यवसायी रोशन खान उनकी जिंदगी में आए।

उन्होंने सरोज और उनके बच्चों को अपनाया। विवाह के बाद उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया और सरोज खान के नाम से पहचानी जाने लगीं।साल 1974 में स्वतंत्र कोरियोग्राफर के रूप में शुरुआत करने वाली सरोज खान ने हिंदी सिनेमा के दो हजार से अधिक गीतों को कोरियोग्राफ किया। ‘एक दो तीन’, ‘धक-धक करने लगा’ जैसे सुपरहिट गीतों ने उन्हें अमर बना दिया। तीन राष्ट्रीय पुरस्कार और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाली सरोज खान आज भी संघर्ष, समर्पण और सफलता की मिसाल मानी जाती हैं।

















