दरभंगा, 07 अगस्त (अजय राय) ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (एलएनएमयू) में पीएचडी रेगुलेशन के कथित उल्लंघन को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। हालिया मामला पीएचडी प्रवेश परीक्षा (PAT)-2023 के कोर्स वर्क परीक्षा परिणाम से जुड़ा है, जिसे लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षकों और अकादमिक जगत में गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बिना केंद्रीकृत परीक्षा, बिना परीक्षा फॉर्म और बिना प्रवेश पत्र जारी किए विभाग स्तर पर गोपनीय तरीके से परीक्षा आयोजित कर परिणाम घोषित कर दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि परीक्षा में शामिल सभी अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण घोषित कर दिया गया। जानकारों का कहना है कि राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में कोर्स वर्क पूरा होने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा फॉर्म भरवाए जाते हैं, प्रवेश पत्र जारी होते हैं और केंद्रीकृत परीक्षा केंद्रों पर पारदर्शी ढंग से परीक्षा आयोजित की जाती है।

इसके विपरीत मिथिला विश्वविद्यालय में कथित रूप से सभी नियमों को दरकिनार कर विभागीय स्तर पर परीक्षा कराने से पूरे मामले पर सवाल खड़े हो गए हैं। शिक्षाविद् प्रो. अखिलेश मिश्रा, डॉ. प्रभोद कुमार और नितेश चंद्र ने कहा कि देश के कई विश्वविद्यालयों में पीएचडी नियमों के उल्लंघन के कारण डिग्रियों पर रोक लग चुकी है या उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। उनका कहना है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग और निगरानी विभाग में शिकायतें लंबित रहने के बावजूद ऐसी प्रक्रिया अपनाना अत्यंत चिंताजनक है। नियमों के अनुसार छह माह का नियमित कोर्स वर्क पूरा करने और न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति रखने वाले शोधार्थी ही परीक्षा में शामिल होने के पात्र होते हैं। परीक्षा में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए संबंधित विभाग के शिक्षक परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकते और उसी विभाग में परीक्षा केंद्र भी नहीं बनाया जा सकता।

साथ ही, उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य हैं। विश्वविद्यालय में पीएचडी से जुड़े विवाद पहले भी सामने आ चुके हैं। निगरानी विभाग और केंद्रीय सतर्कता आयोग में पैट-2020, 2021-22 और 2023 से संबंधित कई शिकायतें लंबित हैं। इनमें निर्धारित सीटों से अधिक नामांकन, क्षमता से अधिक शोधार्थियों को गाइड आवंटित करने तथा अन्य अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। इस पूरे मामले पर विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी डॉ. आर.एन. चौरसिया ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। अब विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।













