बक्सर, 27 जुलाई (विक्रांत) बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में मंगलवार, 28 जुलाई 2026 को सुबह 10 बजे विश्वविद्यालय के मिनी ऑडिटोरियम में 29वीं प्रसार शिक्षा परिषद (एक्सटेंशन एजुकेशन काउंसिल) की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित होगी। बैठक की अध्यक्षता कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह करेंगे, जबकि कृषि प्रसार के प्रख्यात विशेषज्ञ एवं भारत सरकार के योजना आयोग के कृषि विषयक पूर्व सलाहकार डॉ. वी. बी. सदामते विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। बैठक में विश्वविद्यालय के सभी महाविद्यालयों, अनुसंधान एवं प्रसार शिक्षा निदेशालय, विभागाध्यक्षों, वरिष्ठ वैज्ञानिकों, अधिकारियों तथा विश्वविद्यालय के अधीन संचालित सभी कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष भाग लेंगे। बैठक का प्रमुख एजेंडा विश्वविद्यालय की “लैब टू लैंड” अवधारणा को और अधिक प्रभावी बनाना है, ताकि अनुसंधान प्रयोगशालाओं में विकसित उन्नत कृषि तकनीक, नई किस्में, उत्पादन एवं संरक्षण तकनीक, कृषि यंत्र, मूल्य संवर्धन तकनीक और किसानोपयोगी नवाचारों का लाभ तेजी से राज्य के किसानों तक पहुंच सके।

कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के निर्देश पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों द्वारा विकसित एवं सत्यापित तकनीकों, उत्पादों और अनुशंसाओं का संकलन किया गया है। परिषद की बैठक में इन तकनीकों की उपयोगिता, किसानों के बीच स्वीकार्यता, विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में उनकी प्रभावशीलता तथा राज्यव्यापी प्रसार की संभावनाओं पर विस्तार से विचार-विमर्श होगा। डॉ. वी. बी. सदामते अनुसंधान और प्रसार तंत्र के बीच बेहतर समन्वय, प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों को किसानों तक शीघ्र पहुंचाने के उपायों पर अपने सुझाव देंगे। बैठक में सभी कृषि विज्ञान केंद्रों की प्रगति रिपोर्ट की विस्तृत समीक्षा भी होगी।

गत वर्ष संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन, किसान सहभागिता, नवाचारों और उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हुए आगामी वर्ष की कार्ययोजना, प्राथमिकताओं और प्रसार रणनीति तय की जाएगी। साथ ही ऐसी तकनीकों की पहचान की जाएगी जिन्हें बिहार के विभिन्न कृषि क्षेत्रों में किसान आसानी से अपना सकें। इनके व्यापक प्रसार के लिए फील्ड डेमोंस्ट्रेशन, किसान प्रशिक्षण, गोष्ठियों, किसान मेलों और डिजिटल माध्यमों के उपयोग की रणनीति भी बनाई जाएगी। विश्वविद्यालय का मानना है कि यह बैठक अनुसंधान और प्रसार के बीच मजबूत समन्वय स्थापित कर किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन लागत घटाने और जलवायु-अनुकूल कृषि को नई गति देने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।














