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मृत्युभोज

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में मध्यप्रदेश, बालाघाट के सुप्रसिद्ध कवि भाऊराव महंत जी की एक नवगीत

अपने ही घर बूढ़ी काकी

छुप-छुप रोती रोज।

पाल-पोसकर बड़ा किया

अब आँखों गड़ती है,

बेटे-बहुएँ व्यंग्य बोलतें

चुप रह सुनती है,

दुख में बीत रहा है जीवन

करता सुख की खोज।

जोड़-जोड़ कर श्रम की ईंटें

खड़ा किया था घर,

दर-दर भटक रही बेचारी

आज हुई बेघर,

तरस रही अब दाने को,

वे खाते छप्पन भोग।

मरी अचानक किस्मत उसकी

कितनी खोटी थी,

मिली पास जो कई दिनों की

सूखी रोटी थी,

खुश हैं बेटे आज गाँव को

खिला मृत्यु का भोज।

~ भाऊराव महंत

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