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मलक्का बना नया रणक्षेत्र: होर्मुज से आगे बढ़ा वैश्विक तनाव, अमेरिका-इंडोनेशिया समझौते से बदला खेल

नई दिल्ली, 15 अप्रैल (अशोक “अश्क”) मिडिल ईस्ट में स्ट्रेट ऑफ हार्मुज पर बढ़ते तनाव के बीच अब दुनिया की नजरें दक्षिण-पूर्व एशिया के बेहद अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ मलक्का पर टिक गई हैं। अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच हुए ताजा रक्षा समझौते ने वैश्विक कूटनीति में हलचल मचा दी है और इस रणनीतिक जलडमरूमध्य को संभावित शक्ति संघर्ष का नया केंद्र बना दिया है। हाल ही में हुए इस समझौते के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र में उड़ान भरने की अनुमति दी गई है।

आधिकारिक तौर पर इसे रक्षा सहयोग बताया जा रहा है, लेकिन जानकार इसे समुद्री नियंत्रण की बड़ी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। इससे अमेरिका को मलक्का जलडमरूमध्य पर सीधी निगरानी और सैन्य पहुंच मिल गई है। दरअसल, जहां होर्मुज मुख्य रूप से तेल आपूर्ति का मार्ग है, वहीं मलक्का ऊर्जा के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक कलपुर्जों और वैश्विक व्यापार का सबसे व्यस्त रास्ता माना जाता है। चीन की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, जिसे बीजिंग अपनी ‘मलक्का दुविधा’ कहता है।

इस क्षेत्र का प्रबंधन इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देश मिलकर करते हैं, जो अपनी संप्रभुता को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं। ऐसे में किसी बाहरी शक्ति की बढ़ती सैन्य मौजूदगी क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है। खासकर सिंगापुर, जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह इस जलमार्ग पर निर्भर है, किसी भी तनाव से सीधे प्रभावित हो सकता है।इधर भारत की भूमिका भी इस बदलते समीकरण में बेहद अहम हो गई है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की रणनीतिक स्थिति भारत को प्राकृतिक बढ़त देती है।

कैंपबेल बे स्थित वायुसेना स्टेशन इस क्षेत्र की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत और अमेरिका अपनी साझेदारी मजबूत कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज से मलक्का तक अमेरिका की सक्रियता यह संकेत देती है कि वैश्विक शक्तियां अब समुद्री गलियारों पर पकड़ मजबूत करने की होड़ में हैं। आने वाले समय में मलक्का सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक वर्चस्व की जंग का प्रमुख मंच बन सकता है।

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