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हमारा खत तुम्हारा खत

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में उत्तर प्रदेश इटावा से सुप्रसिद्ध कवि प्रमोद तिवारी हंस जी की एक गीतिका

रखा तो साथ में ही था हमारा खत तुम्हारा खत।

मगर मिल ही नहीं पाया हमारा मत तुम्हारा मत।

कभी तुम ही नहीं आए कभी हम ही नहीं आए,

प्रतीक्षा रत रही हर दम हमारी छत तुम्हारी छत।

हमारी इस कहानी का कभी ये अन्त भी होगा,

रहे इस बात से ही थे न तुम अवगत न हम अवगत।

लगी जो बात करने की शुरू से ही सितारों से,

नहीं छूटी कभी पल भर हमारी लत तुम्हारी लत।

कभी नजदीक से जाकर हकीकत जान लेने की,

न तुम ही कर सके हिम्मत न हम ही कर सके हिम्मत।

रहे मतभेद आपस में उभय गुण एक था फिर भी,

न हमने की कभी नफरत न तुमने की कभी नफरत।

किसी को दोष देना भी बड़ी -सी भूल ही होगी,

हमारी थी यही किस्मत तुम्हारी भी यही किस्मत।

~ प्रमोद तिवारी हंस

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