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सबौर कृषि विश्वविद्यालय में गूंजी शहद क्रांति की आवाज, मधुमक्खियां बचेंगी तो धरती बचेगी

बक्सर, 20 मई (विक्रांत) भागलपुर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रांगण में बुधवार को विश्व मधुमक्खी दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। कीट विज्ञान विभाग के मधुमक्खीपालन सह शहद उत्पादन इकाई द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में “मनुष्य और पृथ्वी के लिए मधुमक्खियां” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला एवं गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, किसानों, विद्यार्थियों और मधुमक्खी पालकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।कार्यक्रम का उद्घाटन बिहार कृषि महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. रूबी रानी ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि किसानों का मधुमक्खी पालन की ओर बढ़ता रुझान ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है।

उन्होंने शहद की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और बाजार आधारित उत्पादन पर विशेष जोर देते हुए कहा कि मधुमक्खियां केवल शहद ही नहीं देतीं, बल्कि फसलों के परागण में भी अहम भूमिका निभाती हैं। कीट विज्ञान विभाग की अध्यक्ष डॉ. किरण कुमारी ने मधुमक्खी पालन के लाभ और उससे मिलने वाले विभिन्न उत्पादों के औषधीय महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। कार्यक्रम में 65 से अधिक ग्रामीण युवा, किसान, वैज्ञानिक और विद्यार्थी शामिल हुए। विशेषज्ञों ने मधुमक्खी बक्सों के वैज्ञानिक प्रबंधन, उत्पादक संघ के गठन और मधुमक्खी पालकों तथा वैज्ञानिकों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। मधुमक्खीपालन इकाई के नोडल पदाधिकारी डॉ. रामानुज विश्वकर्मा ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ और राष्ट्रीय मधुमक्खी परिषद के तत्वावधान में यह कार्यक्रम पूरी दुनिया में मनाया जा रहा है।

उन्होंने परागणकर्ताओं की घटती संख्या पर चिंता जताते हुए उनके संरक्षण के लिए वैश्विक प्रयासों की जानकारी दी।तकनीकी सत्र में डॉ. श्याम बाबू साह ने कीटनाशकों से मधुमक्खियों को होने वाले नुकसान और उसके बचाव के उपाय बताए। वहीं प्रगतिशील मधुमक्खी पालक राम स्वरूप प्रसाद सिंह ने मधुमक्खियों के संरक्षण का आह्वान करते हुए सरकारी स्कूलों के मध्यान भोजन में शहद शामिल करने की मांग उठाई। कार्यक्रम के अंत में वैज्ञानिकों और किसानों के बीच खुली परिचर्चा हुई, जिसमें मधुमक्खी पालन से जुड़ी समस्याओं और समाधान पर गंभीर चर्चा की गई।

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