पटना, 15 जून (पटना डेस्क) कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के प्रस्तावित बिहार और उत्तर प्रदेश दौरे से पहले पार्टी संगठन की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। 10 जुलाई को प्रयागराज और 11 जुलाई को पटना में छात्र सम्मेलनों के आयोजन की तैयारी चल रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर संगठनात्मक कमजोरी कांग्रेस की राह में बड़ी बाधा बनती दिखाई दे रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में प्रदेश नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। कई नेता प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और प्रभारी अविनाश पांडेय की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। अगले वर्ष होने वाले चुनावों को देखते हुए संगठन में व्यापक फेरबदल की मांग तेज हो गई है। हाल ही में अजय राय को दिल्ली बुलाया गया था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व से प्रस्तावित मुलाकात नहीं हो सकी, जिससे अटकलों का बाजार और गर्म हो गया।

दूसरी ओर बिहार कांग्रेस की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। पिछले आठ वर्षों में चार प्रदेश अध्यक्ष बदल चुके हैं, लेकिन अब तक प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया है। पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी के समय बनी कमेटी उनके दल बदलने के बाद निष्क्रिय हो गई। इसके बाद मदन मोहन झा, अखिलेश प्रसाद सिंह और राजेश राम अध्यक्ष बने, लेकिन संगठनात्मक ढांचे को पूरी तरह खड़ा नहीं कर सके।स्थिति यह है कि हाल में प्रवक्ताओं की नियुक्ति के लिए बड़े स्तर पर साक्षात्कार हुए, मगर चार महीने बाद भी नियुक्तियों की घोषणा नहीं हो सकी। ऐसे में राहुल गांधी के छात्र सम्मेलन की सफलता को लेकर पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि राहुल गांधी बिहार में प्रभावी संदेश देना चाहते हैं तो उन्हें महागठबंधन के प्रमुख नेताओं तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी और दीपांकर भट्टाचार्य से समन्वय बढ़ाना होगा। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि केवल बड़े आयोजन पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि संगठन को मजबूत कर निरंतर राजनीतिक सक्रियता दिखानी होगी। राहुल के दौरे से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब भी संगठन को धार देने की ही है।












