नई दिल्ली, 27 अप्रैल (अशोक “अश्क”) अब तक मानसून को राहत का मौसम माना जाता रहा है, लेकिन ताजा अंतरराष्ट्रीय शोध ने इस धारणा को झकझोर दिया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि मानसून के दौरान बढ़ने वाली उमस भरी गर्मी शुष्क लू से कहीं अधिक जानलेवा साबित हो सकती है। यह खुलासा यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग, यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के संयुक्त अध्ययन में हुआ है।

करीब 84 वर्षों (1940-2023) के मौसम आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में मानसून के प्रभाव से गर्मी का खतरा अचानक 125 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। शोध में वैज्ञानिकों ने उन विशेष मौसम पैटर्न की पहचान की है, जो हवा में नमी और तापमान के खतरनाक मिश्रण को जन्म देते हैं। इसे ‘वेट-बल्ब तापमान’ कहा जाता है, जो मानव शरीर के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, उमस भरी गर्मी में शरीर का पसीना सूख नहीं पाता, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं हो पाता। इसके कारण कुछ ही घंटों में हीटस्ट्रोक या हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती है।

इस शोध के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ अक्षय देवरास ने कहा कि लोग आमतौर पर शुष्क लू से तो सतर्क रहते हैं, लेकिन मानसून की उमस को नजरअंदाज कर देते हैं, जो अधिक खतरनाक है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जब मानसून सक्रिय होता है, तब गंगा के मैदानी क्षेत्र खासतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। वहीं, मानसून में ब्रेक आने पर यह खतरा तटीय और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों की ओर बढ़ जाता है। दिल्ली और एनसीआर के लिए यह रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। घनी आबादी और कंक्रीट संरचनाओं के कारण यहां ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव बनता है। सफदरजंग, पालम, आईटीओ और कश्मीरी गेट जैसे क्षेत्रों में वेट-बल्ब तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है, जहां 35-38 डिग्री तापमान भी 45 डिग्री से अधिक महसूस होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस नई तकनीक से 28 दिन पहले ही चेतावनी जारी की जा सकेगी, जिससे समय रहते तैयारी कर लोगों की जान बचाई जा सकती है।

















