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मां का घर भी

आज सहितिक आंगन में बालाघाट, मध्यप्रदेश के सुप्रसिद्ध कवि अशोक सिहांसने “असीम” जी की एक ग़ज़ल

गाँवों में कम आना जाना होता है

माँ का घर ही एक बहाना होता है।

बीवी बच्चे भी हद तक ज़िद करते हैं

कहते हैं के’शहर सुहाना होता है।

मिट्टी की ख़ुशबू से लिपटे वक़्त हुआ

पत्थर दिल बनकर मुस्काना होता है।

खेती बाड़ी का मतलब है मैले हाथ

तपती धूप में जान सुखाना होता है।

इस दुनियाँ में हर पल जीने की ख़ातिर

ख़ुद सपनों को आग लगाना होता है।

टूटे रिश्ते गाँठ बनेंगे जुड़ने पर

भारी मन से हाथ मिलाना होता है।

किस किस को समझाएंगे हम आप “असीम”

आँखों को भी आम दिखाना होता है।

~अशोक सिहांसने “असीम”

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