पटना, 11 जुलाई (अविनाश कुमार) बिहार में बच्चों के भविष्य को संवारने की दिशा में सरकार ने बड़ा वित्तीय निवेश किया है। राज्य में वर्ष 2013-14 से शुरू हुई बाल बजट व्यवस्था ने पिछले 13 वर्षों में उल्लेखनीय विस्तार दर्ज किया है। इस अवधि में न केवल कुल बाल बजट सात गुना से अधिक बढ़ा है, बल्कि प्रति बच्चे होने वाला सरकारी खर्च भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह जानकारी शुक्रवार को वित्त विभाग की सचिव (व्यय) रचना पाटिल ने यूनिसेफ और चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (सीएनएलयू) के बाल अधिकार केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तकनीकी परामर्श कार्यशाला में दी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013-14 में बिहार का बाल बजट 7,825 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 54,878.21 करोड़ रुपये हो गया।

इसी अवधि में राज्य के कुल बजट में बाल-केंद्रित व्यय की हिस्सेदारी में लगभग 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि प्रति बच्चे होने वाला व्यय सात गुना से भी अधिक बढ़ा है। कार्यशाला में वर्ष 2026-27 के बाल कल्याण बजट की संरचना, वर्गीकरण, आवंटन और व्यय प्रणाली को और अधिक प्रभावी एवं परिणामोन्मुख बनाने पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बच्चों के हित में योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर सुझाव भी दिए।यूनिसेफ बिहार की फील्ड कार्यालय प्रमुख डॉ. मोनिका ओ. निल्सन ने कहा कि बिहार की कुल आबादी का लगभग 48 प्रतिशत, यानी करीब 4.98 करोड़ बच्चे हैं।

ऐसे में राज्य का समग्र और सतत विकास बच्चों पर किए जाने वाले गुणवत्तापूर्ण निवेश पर निर्भर करता है। रचना पाटिल ने बताया कि बाल कल्याण बजट 2026-27 में शिक्षा क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। कुल बाल बजट का 81.56 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभागों के समन्वित प्रयास से ही बाल बजट की प्राथमिकताओं को धरातल पर उतारा जा सकेगा। कार्यशाला में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, वित्त विशेषज्ञ और नीति निर्धारकों ने भी भाग लिया।













