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नज़ारे तुम

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में राजस्थान, जोधपुर से सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ मधुबाला श्रीवास्तव जी की एक ग़ज़ल

मेरी आँखों के दिलकश, इक हसीं नज़ारे तुम।

इस जहान से बढ़कर, मुझको लगते प्यारे तुम।

प्यार के दुपट्टे में, टाँकती हूँ मैं जिसको

आसमानी चादर में , वो मेरे सितारे तुम।

अब तो दिल की चौखट पर, दस्तकें नहीं देते,

क्यूँ नहीं सनम करते, प्यार के इशारे तुम।

ज़िक्र तेरा अक्सर ही, महफ़िलों में होता है,

लोग पूछते हमसे ,कौन हो हमारे तुम।

दूर-दूर रह के भी, दूर कब हुए दिल से,

इस धड़कते दिल की हर, साँस के सहारे तुम।

इक अजब-सी ख़ुशबू है, तेरी इन अदाओं में,

मौसम-ए-बहाराँ तुम , आँखों के शरारे तुम।

अब तो ये दुआ है बस, साथ उम्र भर रहना,

ज़िन्दगी है सागर इक, और हो किनारे तुम।

~ डॉ मधुबाला श्रीवास्तव

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