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ज़माने भर को यूँ हैरत में डाल रख्खा है

आज साहित्यिक आंगन में मध्यप्रदेश, भोपाल की सुप्रसिद्ध कवयित्री अलका “राज” अग्रवाल की एक ग़ज़ल

.ज़माने भर को यूँ हैरत में डाल रख्खा है।

चराग़ देखो हवा नें संभाल रख्खा है।।

दुआ ने मोर्चा जब से संभाल रख्खा है।

सुकून घर का हमेशा बहाल रख्खा है।।

अभी तो ख़ुद से ही ख़ुद को निकाल रख्खा है।

तुम्हारी याद ने करके निढाल रख्खा है ।।

निकल के जाओ तो आशिक़ तड़प के रह जाएं ।

क़सम से आप में कितना कमाल रख्खा है।।

बुज़ुर्गो की थी हिदायत के नेकअमल करना।

के इसका हमने हमेशा ख़याल रख्खा है।।

उलझ के क्यूँ नहीं रेह जाए इसमें दिल मेरा।

सजाके ज़ुल्फ़ों का क्या ख़ूब जाल रख्खा है ।।

अलग ये बात हमें पूछता नहीं कोई।

हमेशा हमने तो सब का ख़याल रख्खा है ।।

निकल के पेहलू से बाहर न ये कहीं आये।

के दिल को तुमने यूँ उलझन में डाल रख्खा है।।

बसा के इश्क़ का ए राज़ इक जहाँ देखो।

के हमने हुस्न को उलझन में डाल रख्खा है।।

~ अलका ” राज़ ” अग्रवाल ,

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