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गवाही

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में तमिलनाडु, चेन्नई की सुप्रसिद्ध कवयित्री शिल्पा बम्ब (जैन) जी की एक कविता

मैं अक्सर जब ठहर जाती हूँ

किसी अनकही बात की दहलीज पर,

तो बस ये समझना

कि ज़हन के किसी कोने में

तुम्हारी आहट हुई है।

जब मैं घंटों तक

आसमान के बदलते रंगों को देखती हूँ,

या बेख्याली में कागज़ पर

कोई टेढ़ा-मेढ़ा सा निशान बनाती हूँ,

तो वो महज़ फुर्सत नहीं होती

वो असल में तुम्हें याद करने की

एक तरकीब होती है।

मुझे अच्छा लगता है

तुम्हारा बिना बात के रूठ जाना,

और मेरा तुम्हें मनाने के बहाने ढूँढना।

मुझे अच्छा लगता है

कि हम घंटों चुप रहें

और फिर भी कोई बात अधूरी न रहे।

मेरे उस तमाम बचपने का,

मेरी इन खामोश दुआओं का,

और मेरी हर उस मुस्कुराहट का

जो तुम्हारी तस्वीर देखकर आती है…

सिर्फ़ एक ही गवाही है,

और सिर्फ़ एक ही सच—

कि मेरा होना, तुम्हारे होने से है।

हाँ, मुझे तुमसे मुहब्बत है।

~ शिल्पा बम्ब (जैन)

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