।पटना, 11 अप्रैल (पटना डेस्क) भारतीय राजनीति में अप्रैल का महीना कई बार सत्ता के बड़े उलटफेर का गवाह बना है। 17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेई की सरकार महज एक वोट (269-270) से गिर गई थी। उस ऐतिहासिक क्षण में कांग्रेस सांसद गिरिधर गमांग का वोट निर्णायक साबित हुआ था, जो उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री होते हुए भी लोकसभा में मतदान करने पहुंचे थे। गिरिधर गोमांग का वह कदम आज भी राजनीतिक गलियारों में बहस का विषय बना हुआ है।

आलोचनाओं के बावजूद उनका तर्क साफ था वह सांसद थे और पार्टी के व्हिप का पालन करना उनका कर्तव्य था। इस एक वोट ने न सिर्फ सरकार गिराई, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक व्याख्याओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया। वाजपेयी सरकार के पतन में जे. जयललिता की भूमिका भी बेहद अहम मानी जाती है। एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता ने आखिरी समय में राजनीतिक समीकरण बदल दिए। मायावती के नेतृत्व वाली बसपा, जिसे समर्थन में माना जा रहा था, अचानक विरोध में खड़ी हो गई।

बीजेपी के रणनीतिकार प्रमोद महाजन की कोशिशें नाकाम रहीं और सत्ता हाथ से निकल गई। अब करीब 27 साल बाद वही सियासी संदर्भ फिर चर्चा में है। कारण हैं नीतिश कुमार, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ही सांसद के रूप में शपथ ली है। सूत्रों के अनुसार, वह 15 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं, जबकि 16 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र प्रस्तावित है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इस बार एक वोट से सरकार गिरने जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन संवैधानिक और नैतिक सवाल फिर उठ सकते हैं क्या कोई मुख्यमंत्री रहते हुए संसद में मतदान करे? यह बहस फिर से जोर पकड़ रही है।उधर, बिहार में सत्ता परिवर्तन की सरगर्मी तेज है। नए मुख्यमंत्री को लेकर चर्चाएं चरम पर हैं, जिसमें उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। अगर नीतीश कुमार इस्तीफा देते हैं, तो करीब दो दशक लंबे ‘नीतीश युग’ का औपचारिक अंत हो जाएगा। कभी नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी रहे नीतीश आज उसी राजनीतिक धुरी के साथ नई पारी की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल यही है,सी क्या इतिहास खुद को दोहराने की तैयारी में है?
















