आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में आर के जैन “राकेश” जी की एक ग़ज़ल

न बेरुखी न जफ़ाओं से खौफ़ आता है!
मुझे तो उनकी निगाहों से खौफ़ आता है!
अंधेरी रात में देखा है आशियाँ जलता,
इसी लिए तो चरागों से खौफ़ आता है !
अमीर ए शह्र पे कैसे यकीन कर ले कोई,
सभी को उसकी मिसालों से खौफ़ आता है!
बहार जब से गई उनके साथ गुलशन की,
यकीन मानो ख़िजांओं से खौफ़ आता है!
जो लेके आए हैं मरहम लगा के ज़ख्म मुझे,
मुझे तो ऐसे ही यारों से खौफ़ आता है!
ख़ुदा को कैसे दिखाऊँ गा मुँह क़यामत में,
यह सोच कर ही गुनाहों से खौफ़ आता है!
बनोगे कैसे सुखनवर जहाँ में तुम “राकेश”,
तुम्हें तो अब भी किताबों से खौफ़ आता है!
~ आर के जैन “राकेश”


















