Image

आरक्षण

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में मध्यप्रदेश, बालाघाट से सुप्रसिद्ध कवि भाऊराव महंत जी की एक नवगीत

आरक्षण की महिमा देखो

आज गधे भी घोड़े होकर

घूम रहे हैं।

हम पिछड़े हैं, हम पिछड़े हैं’

रोज़ गधे सब रेंक रहे हैं।

मार-मार घोड़ों के हिस्से

अपनी रोटी सेंक रहे हैं।

आरक्षण की रोटी खाकर

बदन बनाकर हाथी जैसे

झूम रहे हैं।

लाद पीठ पर भारी बोझा

धोबी घाट चले हैं घोड़े।

और रेस में दौड़ रहे हैं

किस्मत वाले गधे-निगोड़े।

चला न जाये जिनसे घाटी

वो हिमालयी तुंग-शिखर को

चूम रहे हैं।

और चाहिए हिस्सेदारी

माँग रहे हैं देकर धरना।

इन्हीं गधों के आरक्षण

में घायल घोड़ों का है मरना।

आरक्षण की इसी आग में

धधक-धधककर जले कई

मासूम रहे हैं।

~ भाऊराव महंत

Releated Posts

भारत की नारियाँ

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में राष्ट्रीय राजधानी, नई दिल्ली से सुप्रसिद्ध कवयित्री अंशु विनोद गुप्ता जी की…

नशे में नशा कर रहे हो

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में बिहार, समस्तीपुर से सुप्रसिद्ध कवि प्रवीण कुमार ‘चुन्नू’ जी की एक ग़ज़ल…

रात दिन रहता है तेरी याद का दफ्तर खुला

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में पश्चिम बंग, आसनसोल से सुप्रसिद्ध शायरा ग़़ज़ाला तबस्सुम जी की एक ग़ज़ल…

पापा

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में बिहार, बेगूसराय से सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ सुनीता ‘सुमन’ जी की एक कविता…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top