आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में उत्तर प्रदेश, कानपुर से सुप्रसिद्ध कवयित्री कनक लता गौर जी की एक छंद मनहरण धनाक्षरी

स्वागत द्वारिकाधीश, चरण नवाऊँ शीश,
देउ कछु तो आशीष,राजा बनि आये हो।
भूलि गये ग्वाल -बाल, बदले है हाल-चाल,
नई सी है चाल -ढाल, द्वारिका में छाये हो।
कहाँ गयी बाँसुरी है,लेत नहिं सांसरी है,
कर में हूँ आज तुम , चक्र कौ उठाये हो।
मिश्री और माखन सौं, मुँख नहिं सनो आज,
काहे नाहिं मुसकात,बीड़ा कूँ चबाये हो।
नीको न लगत आज , मणि को मुकुट मोय,
धारि के मुकुट मोर, घनश्याम आइए।
राजा बनि तोय कोई ,फायदों मिलैगो नाहिं,
ग्वाल बाल संग मिलि,गऊऐं चराइए।
द्वारिका के नाथ बनि, कहां सो मिलैगी प्रीति,
मात जसुदा के फिर, छैया बन जाइए।
सूने- सूने यमुना के, तट हेरते हैं बाट,
चक्र सुदर्शन छाड़ि, बांसुरी बजाइए।
~ कनक लता गौर

















