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सरसी छंद

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में राजस्थान, जयपुर की सुप्रसिद्ध कवयित्री अनामिका कली जी की एक छंद

जीवन पथ की डगर निराली, मिले धूप अरु -छाँव।

कल तक सब अपने थे लेकिन, आज नहीं है ठाँव।

दर -दर की ठोकर खाती हूँ , छूट गया घर गाँव।

साथी ,संतति छूट गये सब , लगा समय का दाँव।

हाथ पसारे बैठी हूँ मैं, मिला नहीं कुछ काम।

कभी साथ था मेरा बेटा , आज भूलता नाम।

कैसी विपदा आई मुझ पर, रहा नहीं अब धाम।

पल-पल बढ़ता जाता हरदम,जीवन में संग्राम।

मेरे प्यारे सब बेदर्दी , देते मुझको लात।

घर से बेघर मुझे किया है, दे ग़म की सौगात।

दिन तो मेरा गुजर गया है, काटूँ कैसे रात।

हाय! अभागी मेरी किस्मत, बदतर हैं हालात।

इक रोटी को तरस रही मैं, बैठ पसारूँ हाथ।

धन, वैभव सब लूट लिया है, रहा नहीं है नाथ।

आज सड़क पर बैठी हूँ मैं, जैसे बनी अनाथ।

पोता – पोती, बेटा- बेटी , करते नहीं सनाथ।

मैं विपदा की मारी-मारी , ठोकर खाती आज।

धूमिल होते सपने सारे , खोते सारे साज।

जीवन पथ है उल्टा मेरा, भूली हर परवाज।

खूब झाड़ती रौब कभी भी , जब थी मैं सरताज।

~ अनामिका कली

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