आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में बंगाल, आसनसोल से सुप्रसिद्ध शाइरा ग़ज़ाला तबस्सुम जी की एक ग़ज़ल

पहले नदी का ये तो भरोसा मिले मुझे।
जब डूबने लगूं तो किनारा मिले मुझे।
लिखूंगी उसपे बैठ के तिशनालबी के गीत,
सूखी नदी में टूटा सफ़ीना मिले मुझे।
मेरी उदासियों का फ़कत है यही इलाज,
जिसकी तरफ भी देखूं वो हंसता मिले मुझे।
कासे में सबके डाल दे शब भर की चांदनी,
उजली सहर का डूबता तारा मिले मुझे।
बचपन दुबारा बाहों में अपनी समेट ले,
कोई अगर हो ऐसा खिलौना मिले मुझे।
देखूंगी आसमां पे मैं बनते हुए धनक,
बारिश में धूप का कोई टुकड़ा मिले मुझे।
पूरी ग़ज़ल ही कह ली यही सोचते हुए,
कोई तो इक ख़याल कुंआरा मिले मुझे.
~ ग़ज़ाला तबस्सुम

















