आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में बिहार समस्तीपुर के रचनाकार अशोक “अश्क” की एक लघु कथा “बंधन जन्मों का”

खेतों के मेड़ से होता हुआ गुमसुम सा सुभाष चला जा रहा है, जब भी जुम्मा आता है दो दिन पहले से न किसी से बात करता न ही हँसता बोलता है जाने किन ख्यालों में खोया रहता है । आज भी सुबह-सुबह पहुँच गया था डाकिये के घर, अभी पौ फटा भी नही था । पहुंचते ही दरवाजा खटखटाने लगा अंदर से ऊँघते हुए स्वर में डाकिये ने आवाज लगाया कौन सुभाष बेटा जैसे डाकिया को पता हो सुभाष के सिवा कोई और हो ही नही सकता है । फिर तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई सुभाष बोझिल कदमों से लौट आया ! इसके बाद न जाने क्या ढूँढने वो खेतों से होता हुआ झेलम किनारे आ जाता है और सारा दिन तपती धूप में झेलम किनारे बैठा निश्छल निर्मल धारा को देखता रहता है । कभी कभी एक-आध कंकड़ पानी में फेक देता है पानी में वैसे ही हलचल मच जाती है जैसा की उसके मन में मचा है, फिर अचानक बरबराने लगता है क्यों इंसानों को बाँटा जाता है मजहब के झूठे आड़ में क्या बिगाड़ा था मैंने किसी का क्या मैंने ख़ुदा से कहा था मुझे हिन्दू बना दो और मेरी शबनम को मुसलमान ? आखिर कब तक हम जाती धर्म में बंटते रहेंगे….. जब से सियासत ने मुल्क को बाँटा है और शबनम सरहद पार चली गई तब से न कोई खबर है उसकी न कभी कोई चिट्ठी ही आई, पहले तो हर जुम्मे को दो चार चिट्ठी आ ही जाती थी पता नही किस हाल में होगी मेरी शबनम, खत का भी कोई जवाब भी नहीं दिया उसने कहीं….. नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता मेरी शबनम ऐसा नहीं कर सकती इन्ही ख्यालों में सुभाष खोया था ! तभी अचानक गुरमीत की आवाज़ सुनाई पड़ी गुरमीत गन्ने के खेतों के बीचों बिच हाथ में कागज का एक टुकड़ा लिए ख़ुशी से दौड़ता उछलता आ रहा है वह बार-बार सुभाष-सुभाष चिल्ला रहा है । सुभाष एक नज़र मुड़कर देखता है फिर पानी को निहारने लगता है जैसे कोई बात ही नहीं तभी गुरमीत सुभाष के पास हँसता हुआ आता है और कागज का टुकड़ा एक पल के लिए उसके सामने ले जाता है और तुरत हटा लेता है सुभाष लिखाबट देखते ही पहचान जाता है और तेजी से झपटता है ! सुभाष खत पढ़ने लगता है उसके आँखों से आँसू बहने लगते हैं आज शबनम का निकाह है ! बिना कुछ सोचे सुभाष सरहद की तरफ चल पड़ता है गुरमीत उसे रोकने की लाख कोशिश करता है लेकिन नाकाम हो जाता है सुभाष दौड़ता हाँफता सरहद के पास आ जाता है सामने सरहद के बार लगे हैं सुभाष इधर-उधर देखने लगता है तभी अचानक उसके जेहन में शबनम की आवाज़ गूँजने लगती है सुभाष दो कदम और दो कदम और सुभाष, फिर हम सदा के लिए एक हो जाएंगे हमें कोई जुदा नही कर पाएगा दो कदम और सुभाष ! सुभाष आँखे बन्द किये बार के अंदर चला जाता है और दौड़ पड़ता है तभी सीमा पार से एक गोली सुभाष के सीने को चीरती हुई निकल जाती है । सुभाष दौड़े जा रहा है न जाने कितनी गोलियां उसके सीने को छलनी कर देती है सुभाष दूसरे बार के पास गिर पड़ता है उसके आँखों के आगे धुंधली-धुंधली सी शबनम की तस्वीर है । सुभाष के चेहरे पे हल्की मुस्कान छा जाती है जैसे शबनम, सुभाष से कह रही है आ जाओ सुभाष मेरे पास आ जाओ । ये जालिम दुनियाँवाले हमे जमीं पर कभी नहीं मिलने देंगे देखो कब से यहाँ मैं बाहें फैलाए तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ अब तो आ जाओ ! सुभाष की पलकें बन्द होने लगी और सुभाष ने सदा के लिए अपनी शबनम को अपनी पलकों में बन्द कर लिया………. – ~ अशोक “अश्क”


















