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अपने अतीत और कभी वर्तमान से

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में मध्यप्रदेश, रीवा से प्रसिद्ध कवि संगीत पाण्डेय जी की एक बेहद मार्मिक ग़ज़ल

अपने अतीत और कभी वर्तमान से।

मैं लड़ रहा अकेला ही सारे जहान से।

मुझको तबाह करने के मकसद से एक दम,

टूटी हो जैसे कोई बला आसमान से।

खाई है इतनी चोट कि लगता है उम्र भर,

उबरेगी मेरी ज़ीस्त नहीं इस थकान से।

ऐ ज़िंदगी न मुझ पे तू इतना दबाव डाल,

जाऊँगा टूट वर्ना तेरी खींच-तान से।

या-रब मेरे तू और कहीं ले के चल मुझे,

दिल ऊब सा गया है मेरा इस जहान से।

कितनी भी दूरियाँ हों मेरे और उसके बीच,

उतरा नहीं वो शख़्स मगर मेरे ध्यान से।

जीना भी अब तो हो रहा दुश्वार हिज्र में,

“संगीत” मौत भी न आए इत्मीनान से।

~ संगीत पांडेय

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