बक्सर, 10 अप्रैल (विक्रांत) देश को टीबी (क्षय रोग) से मुक्त बनाने के लिए चलाए जा रहे प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी अभियान को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलती नजर आ रही है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने आज एक सराहनीय पहल करते हुए 5 टीबी मरीजों को गोद लेकर उनके उपचार और पोषण की जिम्मेदारी उठाई है। यह पहल ‘प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान’ के तहत चलाई जा रही ‘निक्षय मित्र’ योजना के अंतर्गत की गई है, जिसका उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों को टीबी मरीजों की मदद के लिए आगे लाना है। कार्यक्रम का आयोजन कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह के मार्गदर्शन में तथा छात्र कल्याण निदेशालय के तत्वावधान में किया गया।

कार्यक्रम के दौरान चयनित पांच मरीजों को छह माह तक नियमित रूप से पोषण किट उपलब्ध कराने का संकल्प लिया गया। पहले चरण में मरीजों को पोषण किट वितरित की गई और उन्हें नियमित दवा सेवन, संतुलित आहार तथा समय-समय पर स्वास्थ्य जांच के महत्व के प्रति जागरूक किया गया। अपने संबोधन में कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने कहा कि “टीबी मुक्त भारत का सपना तभी साकार होगा जब समाज के सभी वर्ग मिलकर इसमें भागीदारी निभाएं। विश्वविद्यालय अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है।” उन्होंने यह भी बताया कि मरीजों को हर महीने ताजे फल और सब्जियां भी उपलब्ध कराई जाएंगी। साथ ही, स्वस्थ होने के बाद इन मरीजों की प्रेरणादायक कहानियां विश्वविद्यालय के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और रेडियो के माध्यम से साझा की जाएंगी।

निदेशक छात्र कल्याण डॉ. स्वेता शांभवी ने ‘निक्षय मित्र’ पहल को मरीजों के लिए जीवनदायिनी बताते हुए कहा कि यह सहयोग उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ में अहम भूमिका निभाएगा। वहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सबौर की प्रभारी डॉ. शुभ्रा वर्मा ने जोर दिया कि टीबी के इलाज में पौष्टिक आहार उतना ही जरूरी है जितनी नियमित दवा। कुलसचिव डॉ. मिजानुल हक ने इस तरह के कार्यक्रमों को सामाजिक जागरूकता बढ़ाने वाला बताया, जबकि बिहार कृषि महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. रुबी रानी ने सभी नागरिकों से टीबी उन्मूलन अभियान में सक्रिय भागीदारी की अपील की। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्रमुख, चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मी और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे। मंच संचालन डॉ. अजय भारद्वाज ने किया, जबकि अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। इस पहल ने न केवल मरीजों को नई उम्मीद दी है, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया है कि सामूहिक प्रयास से टीबी जैसी गंभीर बीमारी को हराया जा सकता है।














