पटना, 14 सितम्बर (अविनाश कुमार) आर्थिक तंगी और रूढ़िवादी सोच की बेड़ियां तोड़कर बिहार की ग्रामीण महिलाएं अब बदलाव की नई कहानी लिख रही हैं। ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से जीविका योजना के तहत संचालित ‘जीविका-दीदी की लाइब्रेरी’ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, मार्गदर्शन और रोजगार के अवसरों का मजबूत केंद्र बनकर उभर रही है। सामुदायिक पुस्तकालय सह करियर विकास केंद्र के रूप में संचालित इन लाइब्रेरियों से अब तक एक लाख से अधिक युवा-युवतियां और महिलाएं जुड़ चुके हैं।राज्य में वर्तमान में संकुल स्तरीय संघ (सीएलएफ) के माध्यम से 118 जीविका-दीदी की लाइब्रेरी संचालित हो रही हैं। ये केंद्र सप्ताह के सातों दिन सुबह 9:30 से शाम 5 बजे तक खुले रहते हैं। प्रत्येक लाइब्रेरी में प्रतिदिन औसतन 50 से 70 शिक्षार्थी पहुंचते हैं। खास बात यह है कि इनमें करीब 61 प्रतिशत लड़कियां हैं।

यानी रोजाना राज्यभर में लगभग 5 से 7 हजार युवा इन केंद्रों में बैठकर अपने भविष्य की तैयारी कर रहे हैं। इन पुस्तकालयों में शांत और अनुकूल अध्ययन वातावरण के साथ कंप्यूटर, टैबलेट, हाई-स्पीड इंटरनेट, किताबें, समाचार पत्र और ऑनलाइन पठन-पाठन जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, ऑनलाइन आवेदन में सहायता और विशेषज्ञों के माध्यम से करियर काउंसिलिंग एवं मेंटरिंग भी दी जा रही है।सबसे बड़ी उपलब्धि उन युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ना है, जिन्होंने आर्थिक या अन्य परिस्थितियों के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी। ऐसे शिक्षार्थियों का एनआईओएस, बीबीओएसई और इग्नू जैसे संस्थानों में नामांकन कराकर दोबारा शिक्षा से जोड़ा जा रहा है।

इन लाइब्रेरियों में विद्या-दीदी और लाइब्रेरी मैनेजर के रूप में काम कर हजारों ग्रामीण महिलाएं नियमित आय अर्जित कर रही हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनके परिवार की स्थिति सुधारने के साथ घर और समाज में उनकी निर्णय लेने की क्षमता और सम्मान भी बढ़ाया है।डिजिटल हुनर और शिक्षा से जुड़कर जीविका दीदियों ने साबित किया है कि अवसर और सही मार्गदर्शन मिले तो ग्रामीण महिलाएं न केवल अपना भविष्य बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समाज की तस्वीर भी बदल सकती हैं। ‘जीविका-दीदी की लाइब्रेरी’ इसी बदलाव की मजबूत मिसाल बनकर सामने आई है।













