बक्सर, 4 सितंबर (विक्रांत) बक्सर जिले के नावानगर प्रखंड के अतिमि गांव की रहने वाली रिंकी देवी ने संघर्ष और मेहनत के दम पर अपनी जिंदगी की तस्वीर बदल दी है। कभी परिवार का पेट भरना भी मुश्किल था, आज वही रिंकी देवी अपना ढाबा चला रही हैं और गांव की एक महिला को रोजगार भी दे रही हैं। उनकी कहानी ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायक मिसाल बन गई है। रिंकी देवी का परिवार छह सदस्यों का है, जिसमें पति धर्मेंद्र पासी और चार छोटे बच्चे शामिल हैं। परिवार के पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं था। उनके पति साल के कुछ महीनों में ताड़ी निकालने का काम करते थे। काम की अवधि समाप्त होने के बाद नियमित रोजगार नहीं रहता था।

कभी-कभार मजदूरी मिलने पर घर का खर्च चलता था, जबकि कई बार परिवार के सामने भोजन की समस्या तक खड़ी हो जाती थी। पक्का और सुरक्षित मकान भी परिवार के लिए सपना था। रिंकी देवी की जिंदगी में बदलाव तब शुरू हुआ, जब जीविका से जुड़ी तीन दीदियां उनके घर पहुंचीं और उन्हें एसजेवाई परियोजना की जानकारी दी। उन्होंने स्वयं सहायता समूह से जुड़ने, नियमित बैठकों में भाग लेने और उपलब्ध वित्तीय अवसरों के बारे में समझाया। इसके बाद रिंकी देवी संध्या जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं और ग्राम संगठन की बैठकों में भी सक्रिय भागीदारी शुरू की। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें छोटे व्यवसाय के जरिए आमदनी बढ़ाने का रास्ता मिला। उपलब्ध वित्तीय सहयोग का इस्तेमाल कर उन्होंने प्रखंड के पास चाय-नाश्ते की दुकान शुरू की।

धीरे-धीरे कारोबार बढ़ा और आज यह दुकान ढाबे का रूप ले चुकी है।रिंकी देवी अब ढाबे में विभिन्न खाद्य एवं पेय पदार्थों के साथ सत्तू और अंडे की बिक्री भी करती हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने गांव की एक महिला को अपने व्यवसाय से जोड़कर उसे रोजगार का अवसर दिया है। कभी परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष करने वाली रिंकी देवी आज अपना व्यवसाय बढ़ाने और दूसरों को रोजगार देने का सपना देख रही हैं। उनकी सफलता मेहनत, आत्मविश्वास और अवसर के सदुपयोग की मिसाल है।














