पटना, 19 सितम्बर (अविनाश कुमार) बिहार में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर सियासी और सामाजिक बहस तेज होती दिख रही है। राज्य की आबादी में 17 फीसद से अधिक मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी है। इसके अलावा करीब 0.08 फीसद बौद्ध, 0.05 फीसद ईसाई और 0.01 फीसद सिख आबादी रहती है। ऐसे में अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों के रुख को लेकर चर्चा बनी हुई है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) को अल्पसंख्यक समुदाय के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिलता रहा है। यही कारण है कि UCC जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पार्टी के रुख को लेकर विशेष नजर रखी जा रही है। मुस्लिम समुदाय के बीच UCC को लेकर मुख्य चिंता धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी है।

संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। मुस्लिम पक्ष से जुड़े लोगों का तर्क है कि विवाह, तलाक, विरासत और अन्य पारिवारिक मामलों में लागू धार्मिक परंपराओं को समान नागरिक कानून के दायरे में लाने से उनके धार्मिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।मुस्लिम जानकारों का कहना है कि शरिया इस्लामी धार्मिक परंपरा और न्यायशास्त्र से जुड़ी व्यवस्था है, जिसकी बुनियाद कुरान तथा पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं में मानी जाती है। उनके मुताबिक, इसलिए इससे जुड़े पारिवारिक नियम केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक पहचान का हिस्सा भी हैं। UCC के समर्थक पक्ष की दलील इससे अलग है।

उसका जोर नागरिकों के लिए व्यक्तिगत कानूनों में समानता और एक समान कानूनी व्यवस्था पर रहता है। वहीं विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि समानता सुनिश्चित करने के प्रयास में धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है।बिहार में UCC पर आगे की बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि राज्य में सामाजिक संरचना और राजनीतिक समीकरणों पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।














