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जंतर-मंतर पर आंगनवाड़ी का हुंकार: ‘न्याय दो, हक दो’, तीन दिन तक गूंजा देशभर की सेविकाओं का संघर्ष

नई दिल्ली, 29 अप्रैल (सेंट्रल डेस्क) राजधानी के जंतर मंतर पर आंगनवाड़ी सेविका-सहायिकाओं का गुस्सा फूट पड़ा। ऑल इंडिया आंगनवाड़ी वर्कर्स फेडरेशन (एटक) के आह्वान पर 21 से 23 अप्रैल 2026 तक चले तीन दिवसीय धरना आंदोलन ने सरकार की नीतियों पर तीखा सवाल खड़ा कर दिया। देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचीं हजारों महिलाओं ने भीषण गर्मी के बावजूद अपने अधिकारों के लिए एकजुटता का जबरदस्त प्रदर्शन किया। धरना के अंतिम दिन बिहार, गोवा, मणिपुर और तेलंगाना से आई सेविकाओं और सहायिकाओं ने जंतर-मंतर को नारों से गूंजा दिया।

“न्याय दो, हक दो” के नारों के बीच पूरा इलाका आंदोलन का केंद्र बन गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि दशकों से सेवा देने के बावजूद उन्हें आज तक सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला, जो उनके साथ अन्याय है। फेडरेशन की प्रमुख मांगों में सेवा नियमितीकरण, न्यूनतम मजदूरी लागू करना, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ग्रेच्युटी का भुगतान, सेवानिवृत्त कर्मियों को 10 हजार रुपये मासिक पेंशन, सेवा निवृत्ति की उम्र 65 वर्ष करना और चार नए श्रम कानूनों को वापस लेना शामिल है। इसके साथ ही सेविकाओं के उत्पीड़न पर रोक लगाने और कार्य परिस्थितियों को बेहतर बनाने की भी मांग उठी।

धरना स्थल पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए अमरजीत कौर ने केंद्र सरकार की नीतियों को श्रमिक विरोधी बताते हुए कहा कि 50 वर्षों बाद भी आंगनवाड़ी कर्मियों की मूलभूत मांगें पूरी नहीं की गई है। उन्होंने चार श्रम कानूनों को “काला कानून” करार देते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की। फेडरेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष उषा सहनी ने सरकार के नारी सशक्तिकरण के दावों को खोखला बताते हुए कहा कि जब तक सेविकाओं को सरकारी कर्मी का दर्जा नहीं दिया जाता, तब तक न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की जानी चाहिए। वहीं राष्ट्रीय महासचिव माधुरी क्षीरसागर ने ज्ञापन के हर बिंदु को विस्तार से रखते हुए जल्द लागू करने की मांग दोहराई। बिहार राज्य आंगनवाड़ी कर्मचारी यूनियन के महासचिव कुमार बिंदेश्वर सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की भी अनदेखी कर रही है। उन्होंने कहा कि जब तक सेवा नियमित नहीं होती, सेविका को 26 हजार और सहायिका को 18 हजार रुपये मानदेय दिया जाए। अन्य वक्ताओं ने भी सरकार पर तीखा प्रहार किया। गौतम कुमार सिंह ने हर केंद्र पर डाटा एंट्री ऑपरेटर की नियुक्ति की मांग उठाई, जबकि कुमारी निर्मला ने कहा कि आईसीडीएस के 50 वर्ष पूरे होने के बावजूद सेविकाओं को उनका हक नहीं मिला। लीलावती देवी ने FRS प्रणाली को बंद करने की मांग करते हुए इसे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया।धरना के समापन के बाद प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय श्रम मंत्रालय के सचिव को ज्ञापन सौंपा। अब निगाहें सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। साफ है कि अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।

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