मुजफ्फरपुर, 23 जून (संतोष गुप्ता) बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड स्थित सितुआरा गांव में सुबह की शुरुआत उम्मीद और संघर्ष के साथ होती है। करीब 400 परिवारों वाले इस गांव में अधिकांश लोग अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। यहां की जिंदगी दिहाड़ी मजदूरी पर टिकी है और एक दिन का काम छूटने का मतलब है घर के चूल्हे पर संकट। ग्रामीणों के लिए रोजगार का सबसे बड़ा सहारा रही मनरेगा, जिसे अब “विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण)” यानी वीबी-जी राम जी योजना के नाम से जाना जा रहा है, गांव की कई महिलाओं के लिए अब भी दूर की कौड़ी बनी हुई है। कारण यह है कि वर्षों से आवेदन देने के बावजूद उनका नाम रोजगार सूची में शामिल नहीं हो पाया है।

38 वर्षीय रीता देवी अपने आवेदन की रसीद संभालकर रखती हैं। उनका कहना है कि पंचायत कार्या लय में कई बार गुहार लगाने के बावजूद हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। “कहा जाता है अगली बार नाम जुड़ जाएगा, लेकिन वह अगली बार कब आएगी, कोई नहीं बताता,” वह कहती हैं। आर्थिक तंगी ऐसी है कि कई बार परिवार को उधार लेकर गुजारा करना पड़ता है। टी36 वर्षीय ललिता देवी की समस्या भी कम नहीं है। उनकी सास का नाम सूची में दर्ज है, लेकिन बीमारी और बढ़ती उम्र के कारण वह काम नहीं कर सकती। ललिता खुद काम करना चाहती हैं, लेकिन सूची में नाम नहीं होने के कारण उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता।उधर उमा देवी को समय-समय पर काम तो मिल जाता है, लेकिन मजदूरी भुगतान में देरी उनकी सबसे बड़ी चिंता है।

उनका कहना है कि समय पर पैसा नहीं मिलने से बच्चों की पढ़ाई, राशन और दवाइयों पर सीधा असर पड़ता है।केंद्र सरकार ने नई योजना के तहत रोजगार की अवधि 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने, कौशल विकास और डिजिटल निगरानी जैसी व्यवस्थाओं का दावा किया है। लेकिन सितुआरा की महिलाओं का सवाल है कि जब नाम ही सूची में नहीं है, तो अतिरिक्त रोजगार का लाभ कैसे मिलेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी योजना की सफलता उसके नाम या दावों से नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक उसके लाभ पहुंचने से तय होती है। सितुआरा के ग्रामीण आज भी इसी उम्मीद में हैं कि उन्हें काम मिले, नाम सूची में जुड़े और मजदूरी समय पर मिले।













